Blind Faith in Saint
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Blind Faith in Saint

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संत को जांचे, परखे ओर विश्वास करे।

अखिल विश्व मे साधू संतो को अलग अलग नामो से जाणा जाता है। हर एक धर्म को चलाणे मे इनको प्रमुख स्थान दिया गया है। प्रत्येक ग्रंथो मे संत के बारे ज्ञान प्रवाहित किया गया है। प्रत्येक ग्रंथो मे जीवन को कैसे जिया जाये इसको विस्तृत तरीके से, संतो के माध्यम से वर्णन किया गया है। हम सब इनकी बातो को मानकर जीवन जिते है, लेकीन ग्रंथो मे लिखी हर बात को मानणा जरुरी है क्या? इस पर विचार करणा चाहिये। साधू लोगो को हम श्रद्धा से पुजते है ओर ये भोले भाले लोगो का फायदा उठते है। आये दिन कोई ना कोई साधु संत किसी ना केस में फसते जा रहे है और हैरानी की बात तो ये है कि उनके सभी असगंत कार्यो “बलात्कार, हत्या, हत्या की साजिश, यौन शौशन आदि में सम्मिलित होते है” को जानते हुए भी उनके समर्थक इनका विरोध ना कर इनके साथ खड़े नजर आ रहे है। ये साधू संत गुरु के भेस मे हैवानियात करते है. ये साधू संत जीवन मूल्य को ताक पर रखकर अपना काम साधते है। ये लोग वक्त का कैसे फायदा उठाते है। मै किसी साधू संत का विरोधक नही हू। ना किसी भिक्षु का ना पादरी का। किसी को ठेच पाहुचाने का मेरा कोई इरादा नही है। कूछ अच्छे साधू संत समाज को एकता मे बांधणे का कार्य कर रहे है। अच्छी शिक्षा प्रदान कर रहे है। लेकीन आज हम कुछ असामाजिक तत्व की बात कर रहे है। ओर सदा शास्त्रो का धाक दिखाकार गलत सलत काम करवाते है। शास्त्रो की बाते कहकर कैसे उलझाते है इसके उपर एक कहाणी, आपके लिये।

एक घटना से आपको समझ ने आयेगा।

चीन के एक बहुत बड़े गांव में, एक बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। हजारों-लाखों लोग मेले मे इकट्ठे हुए थे। एक छोटा-सा कुआं था, और उस कुएं के ऊपर दीवाल नहीं थी। एक आदमी भीड़ में उस कुएं में गिर गया। वह चिल्ला रहा था, कुएं के भीतर से कि ‘मुझे बचाओ, मैं मर रहा हूं। लेकिन इतना शोर-गुल था बाजार में, कि कौन सुनता! लेकिन तभी एक बौद्ध भिक्षु पानी पीने के लिए रुका उस कुएं पर, नीचे देखा, तो वह आदमी चिल्ला रहा था, ‘मुझे बचाओ!’ उसने भिक्षु को देखा तो उसने हाथ जोड़े, कहा, ‘मुझे जल्दी निकालें। मैं मर रहा हूं। मैं तैरना भी नहीं जानता। मेरे हाथ कांप रहा हैं, मैं किसी तरह ईंटों को पकड़े हुए रुका हूं।’ उस भिक्षु ने कहा, तुम्हें पता नहीं भगवान बुद्ध ने क्या कहा है। भगवान बुद्ध ने कहा है, जीवन तो दुःख हैं, बचकर भी क्या करोगे? जीवन तो असार है, जीवन तो व्यर्थ है। जीवन से तो छूट जाने की कोशिश करनी चाहिये। तो बचकर भी क्या करोगे। दुःख से निकलकर जाओगे कहां? जीवन तो खुद एक बड़ा कुंवा है। इसलिए व्यर्थ की वासना छोड़ो, जीने की वासना छोड़ो। यह जो जीवन की तीव्र वासना है, यही तो पाप का मुल है मोक्ष की कामना करो, जीवन की क्यों कामना करते हो? वो आदमी चिल्लाने लगा, ‘यह समय उपदेश का नहीं, मुझे बाहर निकाल लें। फिर मैं आपकी बातें सुनूंगा। लेकिन उस भिक्षू ने कहा, ‘तुम समझे नहीं। भगवान ने शास्त्रों में यही कहा है कि आदमी को जो भी भोगना पड़ता है, अपने पिछले जन्मों के कर्मों के कारण। तुमने कभी किसी को कुएं में गिराया होगा, इसलिए गिरे हो। स्वभावतः जो तुमने किया है, वह भोग रहे हो। जो जैसा करता है, वैसा भोगता है। नहीं लिखा है शास्त्र में? तो अब निकलने की क्यों कोशिश कर रहे हो? अब भोगो अब पूरे कर्म को भोग लो, तो कर्म से मुक्त हो जाओगे। और मैं तूम्हें बीच में निकालकर क्यों संकट में पडू? क्योंकि भगवान ने ये भी कहा है कि तुम जो करते हो, सब आगा – पीछा सोच लेना, अन्यथा तुम भी कहीं पाप में भागीदार न हो जाओ। मैं तुम्हें निकाल लु और कल तुम चोरी कर लो, तो मैं भी जिम्मेवार हुआ. में तुम्हें बचा लूं, परसों तुम किसी की हत्या कर दो, तो मैं भी पापी हुआ। क्षमा करो, मैं मोक्ष की कोशिश में लगा हूं। मैं किसी झंझट में, किसी उपद्रव में नहीं पड़ना चाहता। नमस्कार! भगवान तुम्हारी रक्षा करे!’ वह भिक्षु आगे बढ़ गया।

भिक्षु गया कि कन्फ्यूशियस को मानने वाला एक दूसरा फकीर, कुएं पर आ गया। उसने भी नीचे झांककर देखा। वह आदमी चिल्लाया कि ‘बचाओ। अब मेरी ज्यादा सम्भावना नहीं है बचने की। जल्दी मुझे नहीं निकाला गया, तो मैं मर जाऊंगा।’ उस आदमी ने कहा कि ‘देखा, यही तो कन्फ्यूशियस ने कहा है अपनी किताब में कि हर कुएं के ऊपर दीवाल जरूर होनी चाहिए, दिवारे होना चाहिए। जिस राज्य की कुएं की दीवारे नहीं होतीं, वह राज्य अन्यायी है। तुम घबराओ मत। मै आन्दोलन चलाऊंगा। हर कुएं पर दिवार बंधवा दूंगा। मैं एक आंदोलन पैदा करूंगा समाज-सेवा का और मैं जाकर लोगों को कहूंगा कि हर कुएं पर दिवार होना चाहिए। तुम बिल्कुल बेफिक्र रहो। उस आदमी ने कहा, ‘क्या बातें कर रहे हो! बेफिक्र! में मर जाऊंगा। ये दिवार कब बनेंगे? मैं तो गिर चुका हूं, अब दिवार के बनने से क्या होगा? कृपा कर मुझे पहले बाहर निकाल लो। उसने कहा, ‘इतनी फुरसंत कहां, एक-एक आदमी की फिक्र करने की। मैं पूरे समाज का ही परिवर्तन चाहता हूं। सामाजिक क्रांति चाहता हू। एक आदमी के बनने-मिटने से क्या होता है? तुम शहीद हो जाओ। तुम फिक्र मत करो। तुम्हारा नाम किताबों में लिखा जाएगा। और शहीदों के मजारों पर मेले लगेंगे। तुम घबरओ मत, शहीदों की मजारों पर तो मेले भरते हैं, तुम्हारी मजार पर भी मेले भरेंगे। लोग हजारों साल तक याद रखेंगे कि एक आदमी ने कुएं में गिरकर सब कुओ पर दिवार बंधवा दिए थे! मैं अभी जाता हूं और आन्दोलन खड़ा करता हूँ। वह आदमी चिल्लाता रहा। वह भकीर चला गया और भीड़ में मंच पर खड़ा हो गया और लोगों को समझाने लगा कि देखो, जब तक कन्फ्यूशियस की बात नहीं सुनी जाएगी, तो दुनिया में इसी तरह के कष्ट होते रहेगें। देखो, वह आदमी कुएं में पड़ा है !’ यह आदमी भी एक सबूत बन गया है। कन्फ्यूशियस की बात को सिद्ध करने का, एक प्रमाण बन गया! वो आदमी वही कर रहा है, जो दुनिया के सब समाज-सुधारक करते हैं। लेकिन वह आदमी मरा जा रहा है, उसके प्राण निकले जा रहे हैं। आज उसे पहली दफा पता चला है कि अच्छी बातें करने वाले लोग क्या कर सकते हैं!

तभी एक ईसाई मिशनरी भी आ गया उस कुएं पर। उसने भी झाककर देखा। आदमी बोल भी नहीं पाया था कि उसने कहा, घबराओ मत। उसने अपने झोले से रस्सी निकाली। उसने रस्सी नीचे फेकी, जल्दी कुएं में उतरा ओर उस आदमी को बाहर निकाला। वो आदमी कहने लगा धन्य है आप! आप सच्चे आदगी मिले मुझे। बाकी दो लोग आये थे, उन्होंने मुझे उपदेश दिया। आपकी बड़ी कृपा हुई। आपने मुझे बचाया!’ उस मिशनरी ने कहा, ‘क्षमा करो। तुम गलत मत समझ लेना। मैंने तुम्हें नहीं बचाया। वो तो जीसस क्राइस्ट ने कहा है कि सेवा करे, वो भगवान का प्यारा होता है। सो हम सेवा कर रहे है, ताकि भगवान के प्यारे हो जाएं। हमें तुमसे क्या लेना-देना है। यह तो हम स्वर्ग की खोज कर रहे हैं। और हम तो खुश होते हैं, जब कोई कुएं में गिरा दिखाई पड़ जाये ओर हमे सेवा का मौका मिल जाये। हम तो अवसर की खोज में हैं कि कहीं सेवा का कोई मौका मिल जाए, हम किसी को बचा लें। इसलिए हम रस्सी हमेशा पास रखते हैं, जहां मौका आ जाए। मकान में आग लग जाए, हम कूद कर अन्दर हो जाते हैं। कोई पानी में डूबने लगे हम कुद जाते है बचाने. तुम बड़े अच्छे हो, तुमने हमारे स्वर्ग की एक सीढ़ी बना दी। अपने बच्चों को भी समझाना कि कुएं में गिरते रहें, तो हम बचाते रहें। हमे सेवा का भी तो मौका मिलना चाहिए। सेवा का जो मौका देते हैं, वे स्वर्ग की सीडियां बनते हैं। उनके कंधों पर पैर रख रखकर कुछ लोग स्वर्ग चले जाते हैं बीमारों की सेवा करके, गरीब की सेवा करके, कुएं में गिरे की सेवा करके कुछ लोग स्वर्ग की यात्रा तय करते हैं।

ये तीनों किताबों को बीच में से लेते हैं, मरते हुए जीवित आदमी को, तथ्य को, वह जो सामने घटीत हो रहा है, वह उन्हें उतना मूल्यवान नहीं है, जितनी बह किताब जो उन्होंने पड़ी है। इसलिए वह मरता हुआ आदमी, वह टूटती हुई श्वास, वह सामने एक जीवन के दीये का बुझ जाना, उन्हें दिखाई नही पड़ता। हमारे साथ भी यही होता है। मैं कोई भास्त्रों, साधू संतो का विरोधी नहीं हू। केवल इतना कह रहा हूँ कि जीवन का साक्षात्, जीवन का सीधा अनुभव करे, जांचे परखे ओर विश्वास करे।

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