ध्यान – आप अशांत हो।

ध्यान – आप अशांत हो।

  • Post author:

आज आप जो पढणे जा रहे, वो एक अद्भुत कहाणी है। जीवन मे होणे वाली प्रत्येक घटना को आप कीस नजरीये से देखते हो। इस पर सब बाते निर्भर करती है। सुख- दुख ये दोनो समान बाते है लेकीन हम उनकी गहराई तक ना जाकर उपर उपर से हि निष्कर्ष लगा लेते है। जीवन मे आनेवाले प्रत्येक सही तरीके से अंदाजा लगाये तो दुखो का समाधान मिलता है। खाली हम उसे खोजना बंद कर देते है।

सभी धर्मो मे ध्यान को महत्व दिया गया है. कृष्ण रहे, बुद्ध रहे, महावीर रहे ओर भी बहोत है, इन सभी ने इसी के माध्यम से सारे प्रश्न हल किये है, हर कठनाई का रास्ता निकाला है। आत्मशाक्षात्कार, आत्मबोध, चिंतन, ध्यान इसे आप कुछ भी कह सकते हो। बस आपको आपकी अंतर आत्मा को जगाणा चाहिये। पहचानना है।

एक सुंदर कहाणी है, आपके लिये।

एक जर्मन विचारक था हेरीगल। उसे इच्छा थी की वो ध्यान सिखे इसलिये वो जापान गया। तीन साल तक वो जपान मे रहा।वहा पार एक झेन फकीर था।उन्होने उनके के पास ध्यान सीखने को बहुत कोशिश की, लेकिन सीख नहीं पाया और बहुत से फकीरों से मिला। लेकीन ध्यान की गहराई को समज नही पाया ओर ऊब गया और सोचा कि लौट जाऊ। जिस दिन वह लौटना चाहता था, उसी दिन उसने, जिस होटल में ठहरा था, उसके मैंनेजर से कहा, ‘मैं उदास लौटता रहा हूँ। तीन साल मेहनत की और यह सोचकर आया था कि पूरब में मुझे वो शांती मिल जायेगी। लेकिन वह न मिली। मुझे वह आदमी न मिला जो कि शान्त हो जो मुझे शिखा सके।’ तो उस होटल के मैनेजर ने कहा, ‘आज और एक दिन रुक जायें। एक आदमी की मुझे खबर है, उससे बिना मिले मत जाना, अन्यथा पूरब के सम्बन्ध में कुछ कहना मत। क्योंकि तुम जिससे मिले हो, वे पूरब के लोग नही थे। वे सिर्फ पूरब में पैदा हुए हैं। वे सब पश्चिम के लोग हैं। तुम उन्हीं  लोगो से मिल रहे हो। तो मैं तुम्हें उस आदमी के पास ले चलता हूँ।’ तो हेरीगल कहा, ‘मेरा तो अब बिलकुल ही मन नही है। मैं बहुत ऊब गया हूँ। न मालूम किन-किन के पास गया! पर समाधान नही हुआ। तो होटल मैंनेजर कहा, ‘फिक्र मत करो, उसको ही यहां बुला लेते हैं। उसने उसको सांझ के समय बुला लिया। और दस पच्चीस मित्रों को भी साथ मे बुलाया है। पांच सात मंजिल होटल के ऊपरी हिस्से पर बैठकर सब लोग खाना खा रहे थे, वे गप-शप कर रहे हैं। चर्चा कर रहे थे। हैरिगेल उस फकीर के पास ही बैठा हुआ था, उसका फकीर का नाम था बोकोजू। बात चल रही थी की अचानक तूफान आ गया और भूकम्प आ गया। सारे मकान कंपने लगे हैं, हिलने लगे।   

qwickin dhyan

तो सभी लोग इधर उधर भागणे लगे। हैरिगेल भी भागा । भागते वक्त उसको ख्याल आया कि वह फकीर भी भाग गया होगा कहीं। उसने पीछे लोट कर देखा तो वो फकीर आंख बन्द करके अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ है। तो हैरिगेल को ऐसा लगा, इतने खतरे में- सात मंजिल का मकान ढह जायेगा, लकड़ी का मकान है, कभी भी गिर सकता है, और यह आदमी आंख बन्द किये बैठा है! तो हैरिगेल को लगा कि मै भी रुक जाता हू, जो इसके साथ होगा, वह मेरे साथ भी होगा। वह रुक कर उसके पास बैठ गया, लेकिन भय के मारे उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। कुछ सेकेण्ड में भूकम्प तो चला गया। उस फकीर बोकोजू ने आंख खोली और जहां से बात टूट गयी थी भूकम्प के आने से, वहीं से बात शुरू कर दी, जैसे कि भूकम्प हुआ ही न था! वो निर्विकार था। हैरिगेल ने कहा, ‘मुझे याद भी नहीं है कि क्या बात चल रही थी। तो उस बाबत में अब नहीं पूछना है। अब मुझे यह पूछना है कि इस भूकम्प मे क्या हुआ! की आप भागे नहीं? उस फकीर ने बहुत अद्भुत बात कही। उसने कहा, ‘भागा तो मैं भी था। लेकिन तुम बाहर की तरफ भागे, मैं भीतर की तरफ। मरणा तो दोनो जगह है लेकीन तुम्हारे भागने को मैं गलत कहता हूँ। तुम जहां भाग रहे थे और जहाँ भाग रहे हो, वहाँ दोनों जगह भूकम्प। जितना यहां था, और भागने का कोई मतलब नहीं था। मैं उस जगह भागा, जहाँ भूकम्प हो ही नहीं सकता है। मैं वही भाग गया था । भूकम्प मैं हट गया, वापस आ गया। अपनी अंतरात्मा मे। आप बाहरी चीजो को देखकर भाग सकते हो लेकीन अपने आप से कैसे भाग सकते हो। जितना बाहर भागो गे उतना ही अंदर खाली पाओगे। हर समस्या से लढणे के किये पहले अपने आप से लढणा पडता है।

तो जीवन मे ऐसी कोनसी भी समस्या, अडचने नही है, जिसका समाधान नही है। बस उसे खोजना पडता है।

qwickin gautam buddha

ध्यान-

तो ध्यान कोई ऐसी प्रकिया नही की आप शांत हो जाय, मेरा मतलब ये नही है कि आप शांत हो जाये, लेकीन हमारे भीतर उस जगह को खोज लेना है जो, शांत हि है। आप उसे पहचाने। जो दिखता है वो असल मे होता नही, खाली उसको देखणे का नजरिया सही होणा चाहिये।

Leave a Reply