गौतम बुद्ध – जीवन चरित्र

गौतम बुद्ध – जीवन चरित्र

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उनका जन्म 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य  की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तू  के निकट लुम्बिनी में हुआ था. कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया. शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया. गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाए. राजा शुद्धोधन उनके पिता थे. परंपरागत कथा के अनुसार सिद्धार्थ की माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था. उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया. शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है “वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो”. जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की, यह बच्चा  या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा. शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया. सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा. सिद्धार्थ का मन वचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था. इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है. घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता. खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था. सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की.

सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ को तो पढ़ा ही , राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली. कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता. सोलह वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का कन्या यशोधरा  के साथ विवाह हुआ. पिता द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोगों से युक्त महल में वे यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ. लेकिन विवाह के बाद उनका मन वैराग्य में चला और सुख-शांति के लिए उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया.

राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया. तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए. वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई. दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए. पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं. वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले. उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया. उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था. हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था. दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया. उसकी साँस तेजी से चल रही थी. कंधे ढीले पड़ गए थे. बाँहें सूख गई थीं. पेट फूल गया था. चेहरा पीला पड़ गया था. दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था. तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली. चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे. पीछे-पीछे बहुत से लोग थे. कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था. इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया. उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है. धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है. धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है. क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी. चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा. संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया. उसके मन मे संन्यासी के प्रती आदर भाव प्रकट हुये.

सुंदर पत्नी यशोधरा, छोटा बच्चा राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुँचे. वहाँ भिक्षा माँगी.घर घर भिक्षा मांगते हुये सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे. उनसे योग-साधना सीखी. ध्यान लगाना सीखा पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ. वह उरुवेला पहुँचे और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे.

सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया. शरीर सूखकर काँटा हो गया.खाली उनके शरीर मी हद्दीया हि दिख राही थी. छः साल बीत गए तपस्या करते हुए. सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई,मन शांती नही मिली. एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहा थे. उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा “वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो, ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा,” पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ.” ये बात सिद्धार्थ को जँच गई. वह मान गये कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है. अति किसी बात की अच्छी नहीं.

बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे,जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की. ३५ वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे. बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा. वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची. सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था. उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं. सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो.’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई. उसे ज्ञान प्राप्त हुआ. तभी से सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ कहलाए. जिस पिपल  वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष  कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया. ओर यहीसे ज्ञान का प्रचार प्रसार किया.

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