Judgment with discretion
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Judgment with discretion

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विवेक के साथ निर्णय!

आज का लेख राजकारण से प्रेरित है। उनके लिये है जो दिनरात मेहनत तो करते है लेकीन उनको कुछ मिलता नही। जो हर वक्त उनके पीछे पीछे दौडते है. उनका हर आदेश मानते है। उनकी वेठबिगारी करते है। बडे बडे भाषण को सच मानकर खुद को खुशनसीब समजते है। हो सकता है उनका विवेक मर गया हो। आज उनको वास्तव से परिचित होणा है। जो घरबार छोडकर,अपने परिवार को छोडकर, चमचागिरी करते है।

आज कुछ सवाल है उन सामान्य कार्यकर्ताओ के लिये?

साधारण कार्यकर्ता “कुछ ऐसा है जो भाषणों और घोषणाओं में बहुत मूल्यवान है – लेकिन वास्तव में, खोगीर भर्ती, हरकामे, वफादारी, नशे में सरफिरे, जो लोग अपनी हीन भावना को स्वामी भक्ति की तरह दिखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके अलावा, जो लोग हर संभव तरीके से साहेब की ‘इच्छा’ का ख्याल रखते हैं। साहेब, दादा, भाई, नाना, तात्या, भाऊ, सभी तरह के ‘खाते’ संभालते हैं, साधारण कार्यकर्ता इतनी मेहनत लेते है की बिस्तर तक उनको छोड आते है, उन सभी नेता लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का काम करते हैं, जो सत्ता, धन और आतंक के नशे में चूर हैं। इसके अलावा, सामान्य कार्यकर्ता का एक अलग समुदाय है। वह अक्सर पार्टी की विचारधारा से आकर्षित होते है और पार्टी के प्रति वफादार होते है। वे थोड़े शिक्षित, पढ़ने के शौकीन, मौखिक संदर्भ, पार्टी के मूल विचार के अनुसार सरल जीवन जीने वाले, विचारों के लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ता, “बिन पगारी फुल अधिकारी” जो तुलसी का पत्ता घर पर छोड कर आते हैं! ये साधारण कार्यकर्ता, जो अपने बीस साल या तीस साल की उमर में पार्टी में आए थे, ओर पार्टी कार्यालय में साधारण कुर्सियों पर बैठकर बूढ़े हो जाते है। फिर भी इनकी वफादारी बनी रहती है। कोई नेता अगर उनको नाम से पुकारे तो लगता है इनका जीवन धन्य हो गया। यह सामान्य कार्यकर्ता अपने लोगो को बतायेगा की देखो साहब अभी तक मुझे भुले नही। ऐसा लागता है जैसे स्वर्ग पा लिया हो। उन्हें लगता है कि हमारी पार्टी, उसके नेता अभी भी उसी पुरानी, ​​मूल पार्टी प्रेरणा के साथ राजनीति कर रहे हैं। बाहर की दुनिया चाहे कुछ भी कहे, हमें हमेशा सम्मान और मर्यादा के साथ अपने कंधों पर झंडा लेकर चलना चाहिए। इधर कुछ मिले या ना मिले. नेता लोग जैसा कहेंगे वैसे ही करेंगे. उनका आदेश खाली ना जाने पाये. ये उस नेता के पिछे दुम हिलाते हुये चलते है. उस नेता का अपनी पार्टी से मन भर गया, या कुछ ना मिला, या कुछ कार्यवाही होने  का डर हो तो दुसरी पार्टी चले जाते है. लेकीन सामान्य कार्यकर्ता उनके पीछे ही जायेंगे.

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मै आपको कहाणी के माध्यम से समझाणे की कोशिश करता हू…  

इन साधारण कार्यकताओ की हालत भेड- बकरीयो जैसी हो गई है. एक स्कूल में एक शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहा था। और वह कुछ गणित का सवाल पूछ रहा था। फिर उसने एक सवाल दिया, कि एक छोटी-सी बगिया में चारदीवारी के अन्दर बीस भेड़े बन्द हैं। उसमें से एक भेड़ छलांग लगाकर बाहर निकल गयी, तो भीतर कीतनी भेड़े बचीं? एक बच्चा एकदम हाथ हिलाने लगा। यह बच्चा कभी हाथ नहीं हिलाता था। शिक्षक ने पूछा, ‘आज तुझे क्या हो गया है? उसने कहा, ‘मेरे घर में भेड़े हैं, इसलिए जवाब दे सकता हूं। एक भी नहीं बचेगी।’ ‘सब निकल जायेंगी। पीछे एक भी नहीं बचेगी, आप कहते हैं एक निकल गयी, पीछे एक भी नहीं बचेगी ‘ उसने पूछा, ‘मतलब क्या, पागल ! बीस भेड़े थीं, एक निकल गई है।’ उसने कहा, ‘एक निकली होगी गणित में। लेकीन भेड़े का स्वभाव है उसके पीछे जाना इसलिये सब निकल गयीं, पीछे एक नहीं बचती। क्योंकि भेड़े पीछे चलती हैं।” एक गई तो बाकी जो है उसके साथ जायेंगे।

यही गणित प्रश्न नेता लोगो पर लागू होता है। एक नेता अगर वोटिंग का पर्चा भरणे जाता है, या सभा मे जा रहा है, तो उसके पीछे ये लंबी लाईन लगी होती है सामान्य कार्यकताओ की. इधर एक निकल जाये, फिर सारे सामान्य कार्यकर्ता उसके पीछे जय-जयकार करता हुआ, जय महात्मा, जय महात्मा झंडे हिलाता हुआ पीछे चलने लगता है। कोई नहीं पूछेगा कि यह भेड़ के पीछे क्यों चले जा रहे है!

हर इन्सान को अपने बल पर खड़े होना चाहिए। एक-एक आदमी को, किसी के पीछे क्यों चले जा रहे हो? लेकिन हमें यह खयाल ही नहीं रहता। हमारे पास भी भीतर कोई बुद्धि भगवान ने दी है? हम पर भी सोचने की चुनौती है। हमें भी सोचना है। क्यों पीछे चलें किसी नेता के?

लेकिन पीछे चलने में बड़ी सुविधा है। सोचने में श्रम करना पड़ता है, पीछे चलने में कुछ भी नहीं करना पड़ता है। सोचने में बड़ी तकलीफ होती है, सिर पर जोर डालना पड़ता है। पीछे चलने में मजे से चले जा रहे हैं। किसी की पूंछ पकड़े हुए हैं और चले जा रहे हैं। और वह जो आगे है, उसका भी हमें पता नहीं है। वह कभी इस पार्टी मे कभी उस पार्टी मे चले जा रहे हे। वह भी किसी की पूंछ पकड़े है। क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता कि वह न पकड़ा हो। क्योंकि उसके आगे पूंछ खो जाये, तो वह भी घबरा जायेगा कि अब मुझे सोचना पड़ेगा। हो सकता है, जिन्दों की पकड़े हों, मुर्दो की पकड़े हो, किसी न किसी का पकड़े होगा। एक कतार लगी है हजारों हजारो लोगो की. ओर हम उसके पीछे चले जाते है। वो अपने जिंदगी मे सबकुछ प लेता है ओर ये सामान्य कार्यकर्ता भिक का कटोरा लेके उसके पीछे दुम हिलाते हुये जा रहा है। ना उसे घर का पता है, ना परिवार का ना अपने भविष्य के बारे मे सोचता है, बस चाले जा रहा है।

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अपने विवेक से काम करे….

इसीलिये हम जो भी करते हैं, उसका उत्तर हमारे विवेक के पास होना चाहिए, किसी दूसरे विवेक के पास नहीं। मैं जो कर रहा हूं, जो कह रहा हूँ मेरे पास उत्तर होना चाहिए कि मैं क्यों कह रहा हूं। मै क्या कर रहा हू। अगर मैं यह कहता हूं कि दूसरे ने कहा है, तो मैंने मनुष्य होने की योग्यता खो दुंगा। मैं डिसक्वालिफाइड हो गया उसी वक्त जिंदगी से। उसी वक्त मेरे आदमी होने की बात खत्म हो जायेगी। अब मैंने आदमी के तल से अपने को नीचे गिरा लिया है। इसीलिये जिंदगी मे सोच विचार कर फैसले लेने चाहिये। किसी की तरफ भागने से बेहतर अपने अंतरात्मा के पीछे भागो। ओर खुद को पहचानो। नेता लोग सिर्फ अपनी रोटीया सेकते है। इन्हे सामान्य कार्यकर्ता से कोई लेना देणा नही। इसीलिये ध्यान रखे खुदका, अपने परिवार का, समाज का ओर देश का, क्योकी ये सारी चीजे आपसे है।   

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