मीराबाई – भक्ती मे शक्ती।

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मीराबाई का जन्म सन 1498 ई. में पाली के कुड़की गांव में में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ। ये बचपन से ही कृष्णभक्ती में रुचि लेने लगी थीं। मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ था। 

कृष्ण भक्ती –

मीराबाई कृष्णभक्ती मे विरक्त हो गईं और साधु-संतों की संगती में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गई। वह जहाँ जाती थी, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग उन्हें देवी के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। मीरा का समय बहुत बड़ी सामाजिक उथल-पुथल का समय रहा। इन सभी परिस्थितियों के बीच मीरा का रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धति सर्वमान्य बनी।

बड़ी प्यारी घटना है। जब मीरा वृंदावन के सबसे प्रतिष्ठित मंदिर में दर्शन करणे गई थी।

मंदिर के दरवाजे पर पहुंची तो उसे दरवाजे पर रोकने की कोशिश की गई, क्योंकि उस मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध था, क्योंकि उस मंदिर का जो महंत था, वह स्त्रियां नहीं देखता था; वह कहता था : ब्रह्मचारी को स्त्री नहीं देखनी चाहिये। तो वह स्त्रियां नहीं देखता था । मीरा स्त्री थी। तो रोकने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन जो लोग रोकने द्वार पर खड़े थे, वे किंक्तव्य- विमूढ़ हो गये जब मीरा को देखा तो। मीरा नाचती हुई आयी, अपने हाथ में अपना एकतारा लिये बजाती हुई आयी, और उसके पीछे भक्तों का हुजूम आया। सब मदमस्त-मस्ती में वे द्वार-पाल खड़े थे, वे भी ठिठक कर खड़े हो गये। वे भूल ही गये कि रोकना है। तब तक तो मीरा भीतर प्रविष्ट हो गई । हवा की लहर थी एक- भीतर प्रविष्ट हो गई, पहुंच गई मंदिर बीच। पुजारी तो घबड़ा गया । पुजारी कृष्ण की पूजा कर रहा था। उसके हाथ से थाल गिर गया। उसने वर्षों से स्त्री नहीं देखी थी। इस  मंदिर में स्त्री का निषेध था। यह स्त्री यहां भीतर कैसे आ गई !

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द्वार पर द्वारपाल खड़े थे वो भी मीरा के भाव मे डूब गये, पुजारी नही डूबा! क्यो की पुजारी इस जगत में सबसे ज्यादा अन्धे लोग है। जब मीरा मंदिर मे अपने ही मन मे खुश, मदमस्त होकर आयी ओर उसने जो लहर लाई थी उसमे इसमें वे भी भूल गए, क्षण भर को भूल ही गये कि हमारा काम क्या है ! जब याद आयी, तब तक तो मीरा भीतर जा चुकी थी। वह तो बिजली की तरह अंदर चली गई। ओर वो अपने एकतारा पे कीर्तन भी करणे लाग गई थी। कृष्ण के सामने मीरा आकर नाच रही थी, लेकिन पंडित नहीं डूबा। क्यो की पंडित का मन भक्ती मे कम ओर बाहरी लोगो पर ज्यादा रहता है। 

पुजारी ने कहा : हे औरत ! तुझे समझ नही है कि इस मंदिर में स्त्री का निषेध है?”

मीरा ने सुना । मीरा ने कहा : ‘मैं तो सोचती थी, कि कृष्ण के अतिरिक्त और कोई पुरुष है नहीं। तो तुम भी पुरुष हो? मैं तो कृष्ण को ही बस पुरुष मानती हू, और तो सारा जगत उनकी गोपी है; उनके ही साथ रास चल रहा है। तो तुम भी पुरुष हो ? मैंने सोचा नहीं था कि दो पुरुष हैं तो तुम प्रतियोगी हो?’

वह तो घबड़ा गया। पंडित तो समझा नहीं कि अब क्या उत्तर दे। पंडितो के पास बंधे हुए प्रश्नों के उत्तर होते हैं। लेकिन यह प्रश्न तो कभी इस तरह उठा ही नहीं था। किसी ने पूछा ही नहीं था, यह तो कभी किसी ने मीरा के पहले कहा ही नहीं था कि ‘दूसरा भी कोई पुरुष है, यह तो हमने सुना ही नहीं। तुम भी बड़ी अजीब बात कर रहे हो ! तुमको यह बहम कहां से हो गया ? एक कृष्ण ही पुरुष है, बाकी तो सब उसकी प्रेयसियां हैं, वो पूर्ण पुरुष है।”

लेकिन अड़चनें शुरू हो गई। इस घटना के बाद मीरा को वृंदावन में नहीं टिकने दिया गया। संतों के साथ हमने सदा दुर्व्यवहार किया है। मर जाने पर हम पूजते हैं; जीवित हम दुर्व्यवहार करते हैं। मीरा को वृंदावन भी छोड़ देना पड़ा । फिर वह द्वारिका चली गई।

वर्षों के बाद राजस्थान की राजनीति बदली, राजा बदला, राणा सांगा का सबसे छोटा बेटा राजा उदयसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा । वह राणा सांगा का बेटा था और राणा प्रताप का पिता। उदयसिंह बड़ा मानता था मीरा को। उसने अनेक संदेशवाहक भेजे कि मीरा को वापिस लेके आओ। यह हमारा अपमान है । यह राजस्थान का अपमान है कि मीरा गांव-गांव भटके, यहां- वहां जाये । यह लांछन हम पर सदा रहेगा। हम भूलचूकों के लिये क्षमा चाहते है। जो अतीत में हुआ।

लोग खोजने के लिये गये, पंडितों को भेजा, पुरोहितों को भेजा, समझा कर की जहा कही मीरा दिखे उसे ले आओ। लेकिन मीरा सदा समझाकर कह देती कि अब कहां आना-जाना ! अब इस प्राण-प्यारे के मंदिर को छोड़कर कहां जायें। मै रणछोडदासजी के मंदिर में द्वारिका में मस्त हू। लेकीन उदयसिंह ने हार नही मानी बहूत कोशिश की एक सौ आदमियों को भेजा. और कहा कि किसी भी तरह ले आओ, नही माने तो कुछ भी करो चाहे तो धरणा दो लेकीन ले आओ। कहा कि हम उपवास करेंगे, अगर आप नही आयी तो हम यही बैठ जायेंगे। और उन्होंने धरना दे दिया। उन्होंने कहा कि चलना ही होगा, नहीं तो हम यहीं मर जायेंगे।

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भक्त का भगवान मे समा जाणा।

तो मीरा ने कहा : ऐसा है, चलना ही होगा तो मैं जाकर अपने प्यारे को पूछ लूं। अपने गिरीधर को पुछ लु, उनकी बिना आज्ञा के तो न जा सकूंगी तो रणछोड़दासजी को पूछ लु! वह भीतर गई। और कहते हैं, फिर बाहर नहीं लौटी ! कृष्ण की मूर्ति में समा गई!

मीरा की आखिरी घड़ी आ गई थी, महासमाधि की ! मीरा ने कहा होगा : या तो अपने में समा लो मुझे, या मेरे साथ चल पड़ो, क्योंकि अब ये लोग भूखे बैठे हैं, अब मुझे जाना ही पड़ेगा। वह आखिरी घड़ी आ गई, जब भक्त भगवान हो जाता है। यही प्रतीक है उस कथा में कि मीरा फिर नहीं पायी गई। मीरा कृष्ण की मूर्ति में समा गई। अंततः भक्त भगवान में समा ही जाता है।

भक्ती मे शक्ती होती है।

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