सत्य – नया आवरण।

सत्य – नया आवरण।

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सत्य को हमेशा नये शब्द का आवरण चाहिए, जैसे पुराने वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, फिर हम उन्हें बदल देते हैं; नये वस्त्र पहन लेते हैं। वैसेही सत्य को नये तरीको से खोजना चाहिये।

वेद ने संस्कृत के शब्द दिए सत्य को, बुद्ध ने पाली के शब्द दिए, मीरा ने हिंदी के शब्द दिये। भाषा बदल गयी, ढंग बदल गया- क्योंकि लोग बदल गए थे। और अगर तुमने जिद्द की, कि तुम पुराने को पकड़कर वैसे ही चलोगे जैसा पुराना था, तो तुम अक्सर पाओगे कि तुम समसामयिक नहीं हो। और अक्सर तुम झंझटों में पड जाते हो।

पुराणी कहाणी नये ढाचे मे…

एक बड़े मियां जिन्होंने अपनी जिन्दगी में बहुत कुछ कमाया-बनाया था, आखिर वक्त मे बीमार हुए। उनके मन मे फिक्र थी जो उन्हे सताये जा रही थी। उनके पांच बेटों की आपस में बनती नहीं थी। लड़ते ही रहते थे। हर वक्त एक दुसरे से झगडते राहते थे। कभी किसी बात पर इत्तफाक न होता था। आखिर बड़े मियां ने एकता और इत्तफाक की खूबियां बेटों के दिल में उतारने के लिए एक पुरानी तरकीब खयाल में लायी। आपने भी पढ़ी होगी ईसप की किताब में या पंचतंत्र में।

पुरानी तरकीब है, आपने भी सुनी है, पढा है कि पे, कोई बाप मर रहा था। उसने पांच लकड़ियां एक गट्ठे में बांध दी, और अपने बेटों को कहा तोड़ो। उन्होंने गठ्ठा तोड़ने की कोशिश की, लेकिन गठ्ठा नहीं टूट सका। पांच लकड़ियां इकट्ठी मजबूत थीं फिर उसने गठ्ठा खोल दिया, और एक-एक लकड़ी बेटों को दे दी और कहा, अब तोड़ो। उन्होंने तत्क्षण लकड़ियां तोड़ दीं। और बाप ने कहा कि देखो, पांच इकट्ठे होते हैं तो शक्ति होती है, पांच अलग-अलग हो जाते हैं तो निर्बल हो जाते हैं। यही, मेरा तुमसे आखिरी निवेदन है । ऐसा कहकर बाप मर गया।

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अब नये समझ से….मजेदार है

बड़े मियां को यह कहानी याद आयी। सोचा कि उसी कहानी का उपयोग कर लें। बड़े मियां ने अपने बेटों को पास बुलाया और कहा, देखो, अब मैं कुछ ही दिन का मेहमान हूं। सब जाकर एक-एक लकड़ी लाओ। एक ने कहा, लकड़ी! आप लकड़ियों का क्या करोगे?

जमाना बदल गया, पुरानी कहानी में यह बात नही आती कि ‘आप लकड़ियों का क्या करेंगे। वह जमाना और था। बाप ने कहा, लकड़ियां लाओ, लड़के लड़कियां ले आये थे। इधर लड़के ने पूछा कि लकड़ी! आप लकड़ियों का क्या करेंगे? दूसरे ने आहिस्ता से कहा बड़े मियां का दिमाग खराब हो रहा है। लकड़ी नहीं, शायद ककड़ी कह रहे हैं। ककड़ी खाने को जी चाहता होगा।

तीसरे ने कहा : कुछ नही सरदी है, शायद आग जलाने को लकड़ियां मांग रहे हैं।

चौथेवें कहा : बाबूजी, कोयले लाऊं?

पांचवें ने कहा : नहीं जी, कोयले से क्या होगा, उपले लाता हूं। वे ज्यादा अच्छे रहेंगे।

बाप ने कराहते हुए कहा, अरे नालायको, मैं जो कहता हूं वह करो। क्योंकि उसको तो एक सिद्धांत सिद्ध करना था। तो कोयले से तो सिद्ध नहीं होगा, उपले से भी सिद्ध नही होगा- यह तो बात ही उन्होंने बदल दी, सब कहानी खराब किए जा रहे थे। और वह कहानी की बात भी नहीं कह सकता कि पहले से कि, मैं वही पुरानी कहानी बोल रहा हु, नहीं तो मतलब ही… खत्म हो जायेगा। उसको तो छिपाकर रखनी है, वह तो सिद्धांत निकालना है। बाप ने कराहते हुए कहा, अरे नालायको, मैं जो कहता हूं वह करो, कहीं से लकड़ियां लाओ, जंगल से।

एक बेटे ने कहा : यह भी अच्छी रही, जंगल यहां कहां? और जंगल वाले लकड़ी कहां काटने देते हैं! सजा करवाओगे? दूसरे ने कहा, अपने आपे में नहीं है बाबूजी। बक रहे हैं जूनून में क्या-क्या कुछ। तीसरे ने कहा : भाई लकड़ियों वाली बात अपनी समझ में तो बिल कुल नहीं आती। चौथे ने कहा : बड़े मियां ने उम्र भर में एक ही तो ख्वाहिश की है, उसे पूरा करने में हर्ज भी क्या है? ले भी आओ। दिमाग तो मालूम होता है खराब हो गया है, मगर क्या बिगड़ता है, पांच लकड़ियां ही ले आना है! पांचवें ने कहा, अच्छा मैं जाता हूं, टाल पर से लकड़ियां ले आता हूं। वह टाल पर गया, टालवाले से कहा, खान साहब, जरा पांच लड़कियां तो देना। अच्छी मजबूत होंनी चाहिये। टाल वाले ने लकड़ियां दीं। हरेक खासी मोटी और मजबूत थी। ओर बाप के पास आ गया। बाप ने देखा तो उसका दिल बैठ गया, क्योंकि लकड़ियां इतनी मजबूत थीं कि एक-एक भी नहीं तोड़ी जा सकती थीं, तो पांच को पांच को तोड़ने का तो सवाल ही क्या था, यह बताना तो मतलब के खिलाफ ही था कि लकड़ियां क्यों मंगवाई गई हैं और उससे क्या नैतिक परिणाम निकालने की आकांक्षा है। आखिर बेटों से कहा, कि ठीक अब तुम जब इन लकड़ियों को ले ही आये तो गट्ठा बांधो। बेटों में फिर खुसर-पुसर होने लगी। गट्टा ! वह क्यों? अब रस्सी कहां से लायें? भाई बहुत तंग किया इस बुड्ढ़े ने!’

आखिर एक ने अपने पायजामे से नाला निकाला और गट्ठा बांधा। जमाना बदल गया, “तुम कहां की पुरानी कहानी लिए बैठे हो!” बड़े मियां ने कहा, अब इस गट्ठे को तोड़ो। बेटों ने कहा, लो भाई यह भी अच्छी रही, कैसे तोड़े! कुल्हाड़ कहां से लायें। अरे इस बुढ़े के दिमाग को क्या हुंआ है? मरना हो तो मर ही जाओ। अब और तो न सताओ। तंग कर के रखा है।

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बाप ने कहा : कुल्हाड़े से नहीं, हाथों से तोड़ो, घुटने से तोड़ो। बाप ने देखा हाथ से तो टूटनेवाली नहीं है। यह कहानी सब गड़बड़ ही हुई जा रही है। तो उसने कहा, हाथ से न टूटे तो घुटनों से तोड़ो, मगर तोड़ो। बाप का हुकम सिर-आंखों पर। पहले एक ने कोशिश की, फिर दूसरे ने, फिर चौथे ने, फिर पांचवें ने। लकड़ियों का बाल बांका न हुआ। सबने कहा। बाबूजी, हमसे नहीं टूटता यह लकड़ियों का गट्ठा। बाप ने कहा, अच्छा, अब इन लकड़ियों को अलग-अलग कर दो। इनकी रस्सी खोल दो। एक ने जलकर कहा, रस्सी कहां है, मेरा नाला है। अगर आपको खुलवाना ही था तो गट्ठा बंधवाया क्यों था? तुम होश में हो कि तुम्हारा होश बिलकुल खराब हो गया है? लाओ माई कोई पेन्सिल दो, मैं नाले को  अपने पायजामे में वापिस डाल देता हु।

ओर इधर बाप की भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि करना क्या है? कहानी तो पुरानी थी और बड़े मतलब की थी। मगर वक्त बदल गया, लोग बदल गये, ढंग बदल गया, सोचने के हिसाब बदल गया। फिर बाप ने कहा, जब लड़के ने अपना नाला निकाल लिया, तो कहा, इनको, एक-एक लकड़ी को एक-एक करके तोड़ो। लकड़ियां मोटी-मोटी और मजबूत, बहुत कोशिश की, किसी से नहीं टूटी। आखिर में बड़े भाई की बारी थी, उसने एक लकड़ी पर घुटने का पूरा जोर डाला, और तड़ाक की आवाज आयी, बाप ने नसीहत करने के लिए आंखें एकदम खोल दीं। बाप तो तैयारी में था कि नसीहत करने के लिए एकाध तो टूट जाए, क्या देखता है कि बड़ा बेटा बेहोश पड़ा है। लकड़ी सहीसलामत है, उसकी टांग टूट गई।

एक लड़के ने कहा, यह बुड्ढा बहुत जाहिल है। दूसरे ने कहा, अड़ियल ! जिद्दी है!

तीसरे ने कहा : खूसट! सनकी! अकल से पैदल! घमंडी!

चौथे ने कहा : ‘सारे बुड्ढे ऐसे ही होते हैं, कमबख्त मरता भी नहीं। बुड्ढे ने इत्मीनान की सांस ली कि बेटे कम-से-कम एक बात पर एकमत तो हुए। उसके बाद आंखें बंद की और बड़ी शांति से जान दे दी।

सत्य को नये शब्दों की सदा जरूरत है। सत्य पुराने शब्दों में, पुराने ढाचों में आवद्ध होकर मर जाता है। सत्य को नयी उद्भावना चाहिये; नयी तरंग चाहिये; नये गीत चाहिये- तो ही सत्य हृदय तक पहुंचता है।

This Post Has 3 Comments

  1. Shashank Pandey

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  2. Natashuet1w

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