शिव चालीसा : जो मन की शांती प्रदान करता है
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शिव चालीसा : जो मन की शांती प्रदान करता है

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मंत्र पठन करते वक्त एक तरह से आभा मंडल निर्मित होता है। वैज्ञानिक को ने भी मन्त्रो पर रिसर्च कर ये साबित किया है की, मन्त्रो मे एक अल्लोकिक शक्ती समाहित है। आमतौर पर लोग मंत्रो को मात्र कुछ शब्दों की तरह देखते हैं परन्तु वो यह नहीं जानते की इन मन्त्रों की तरंगों में बहुत ताकत होती है। यह कुछ ऐसे-वैसे शब्द नहीं हैं। मन्त्रों के श्रवण मात्र से हमारी चेतना जाग उठती है। मंत्र वह ध्वनि है जो अक्षरों एवं शब्दों के समूह से बनती है। यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक तरंगात्मक ऊर्जा से व्याप्त है जिसके दो प्रकार हैं – नाद एवं प्रकाश। आध्यात्मिक धरातल पर इनमें से शब्द कोई भी एक प्रकार की ऊर्जा दूसरे के बिना सक्रिय नहीं होती। मंत्र मात्र वह ध्वनियाँ नहीं हैं जिन्हें हम कानों से सुनते हैं, यह ध्वनियाँ तो मंत्रों का लौकिक स्वरुप भर हैं। मंत्र से आत्मिक शक्ती जागरूक होती है। मन मे शांती का भाव उत्पन्न होता है। आप मन मे कोई विचार कर के मंत्र का पठन करते है तो वो कार्य जल्दी सिद्ध होता है। सभी धर्मो मे मन्त्रो को मान्यता है। लेकीन आज हम आदि, अनादी, निराकार शिव चालीसा के बारे मे जानेंगे। आप अर्थ सहित उसका महत्व जानेंगे। वैसे तो आप शिव चालीसा का पठन कही भी ओर कभी भी कर सकते है, शिव को किसी पूजा अर्चना की जरुरत नही है। लेकीन विधी विधान से ध्यान करते है, मंत्र पठन करते है तो चमत्कारिक अनुभव आपको आयेंगे। क्योकी उस वक्त मन शांत, एकाग्र रहता है।

शिव चालीसा का पठण कैसे करे 

सूर्योदय से पूर्व स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करें, तत्पश्चात स्वच्छ आसन या कुश के आसन पर बैठकर, शिव लिंग या भगवान शंकर की मूर्ति या शिव यंत्र को ताम्र-पत्र पर खुदवाकर सामने रखें। फिर चंदन, चावल, आक के सफेद पुष्प, धूप, दीप, धतूरे का फल, बेल-पत्र तथा काली मिर्च आदि से पूजन करके शिवजी का ध्यान करते हुए निम्न श्लोक पढ़कर पुष्प समर्पित करें।

Qwickin Lord shiv
Lord Shiv

।।ॐ नमः शिवाय ।।

शिव चालीसा

कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेंद्रहारम् ।

सदा वसंतं हृदयारविंदे, भवं भवानी सहितं नमामि ।।

इसके बाद पुष्प अर्पण करें फिर चालीसा का पाठ करें। पाठ के अंत में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का १०८ बार तुलसी या सफेद चंदन की माला से जप करें। जप के साथ अर्थ की भावना करने से कार्यसिद्धि जल्दी होती है।

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।

कहत अयोध्यादास तुम, देउ अभय वरदान ।।

समस्त मंगलों के ज्ञाता गिरिजा सुत श्री गणेश की जय हो। मैं अयोध्यादास आपसे अभय होने का वर मांगता हूँ।

जय गिरिजापति दीनदयाला । सदा करत संतन प्रतिपाला ।।

भाल चंद्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नागफनी के ।।

दीनों पर दया करने वाले तथा संतों की रक्षा करने वाले, पार्वती के पति शंकर भगवान की जय हो। जिनके मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान है और जिन्होंने कानों में नागफनी के कुण्डल धारण किए हुए हैं।

अंग गौर सिर गंग बहाए । मुण्डमाल तन क्षार लगाए ।।

वस्त्र खाल बाघंबर सोहै । छवि को देखि नाग मुनि मोहै ।।

जिनके अंग गौरवर्ण हैं, सिर से गंगा बह रही है, गले में मुण्डमाला है और शरीर पर भस्म लगी हुई है। जिन्होंने बाघंबर धारण किया हुआ है, ऐसे शिव की शोभा देखकर नाग और मुनि भी मोहित हो जाते हैं।

मैना मातु कि हवै दुलारी । वाम अंग सोहत छवि न्यारी ।।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ।।

महारानी मैना की दुलारी पुत्री पार्वती उनके वाम भाग में सुशोभित हो रही हैं। जिनके हाथ का त्रिशूल अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रहा है, वही निरंतर शत्रुओं का विनाश करता रहता है।

नंदि गणेश सोहैं तहं कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे ।।

कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि को कहि जात न काऊ ।।

भगवान शंकर के समीप नंदी व गणेशजी ऐसे सुंदर लगते हैं, जैसे सागर के मध्य कमल। श्याम, कार्तिकेय और उनके करोड़ों गणों की छवि का बखान करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

देवन जबहीं जाय पुकारा । तबहीं दुःख प्रभु आप निवारा ।।

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ।।

हे प्रभु! जब-जब भी देवताओं ने पुकार की, तब-तब आपने उनके दुखों का निवारण किया है। जब तारकासुर ने उत्पात किया, तब सब देवताओं ने मिलकर रक्षा करने के लिए आपकी गुहार की।

तुरत षडानन आप पठायउ । लव निमेष महं मारि गिरायउ ।।

आप जलंधर असुर संहारा । सुयश तुम्हार विदित संसारा ।।

तब आपने तुरंत स्वामी कार्तिकेय को भेजा जिन्होंने क्षणमात्र में ही तारकासुर राक्षस को मार गिराया। आपने स्वयं जलंधर का संहार किया, जिससे आपके यश तथा बल को सारा संसार जानता है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । सबहिं कृपा करि लीन बचाई ।।

किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरव प्रतिज्ञा तासु पुरारी ।।

त्रिपुर नामक असुर से युद्ध कर आपने देवताओं पर कृपा की, उन सभी को आपने बचा लिया। आपने अपनी जटाओं से गंगा की धारा को छोड़कर भागीरथ के तप की प्रतिज्ञा को पूरा किया था।

दानिन महं तुम सम कोइ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ।।

वेद माहि महिमा तब गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई ।।

संसार के सभी दानियों में आपके समान कोई दानी नहीं है। भक्त आपकी सदा ही वंदना करते रहते हैं। आपके अनादि होने का भेद कोई बता नहीं सका। वेदों में भी आपके नाम की महिमा गाई गई है।

प्रकटी उदधि मथन ते ज्वाला । जरत सुरासुर भए विहाला ।।

कीन्ह दया तह करी सहाई । नीलकंठ तव नाम कहाई ।।

समुद्र-मंथन करने से जब विष उत्पन्न हुआ, तब देवता और राक्षस दोनों ही बेहाल हो गए। तब आपने दया करके उनकी सहायता की और ज्वाला पान किया तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ा।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ।।

सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ।।

रामचंद्रजी ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले आपका पूजन किया और विजयी हो लंका विभीषण को दे दी। भगवान रामचंद्र ने जब सहस्र कमल के द्वारा पूजन किया तो आपने फूलों में विराजमान हो परीक्षा ली।

एक कमल प्रभु राखेउ गोई । कमल नैन पूजन चहं सोई ।।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिये इच्छित वर ।।

आपने एक कमलपुष्प माया से लुप्त कर दिया तो श्रीराम ने अपने कमलनयन से पूजन करना चाहा। जब आपने राघवेंद्र की इस प्रकार की कठोर भक्ति देखी तो प्रसन्न होकर उन्हें मनवांछित वर प्रदान किया।

जय जय जय अनंत अविनासी । करत कृपा सबके घटवासी ।।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ।।

अनंत और अविनाशी शिव की जय हो, सबके हृदय में निवास करने वाले आप सब पर कृपा करते हैं। हे शंकरजी! अनेक दुष्ट मुझे प्रतिदिन सताते हैं। जिससे मैं भ्रमित हो जाता हूं और मुझे चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारौं । यहि अवसर मोहि आन उबारौ ।।

ले त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट ते मोहि आन उबारो ।।

हे नाथ! इन सांसारिक बाधाओं से दुखी होकर मैं आपका स्मरण करता हूं। आप मेरा उद्धार कीजिए। आप अपने त्रिशूल से मेरे शत्रुओं को नष्ट कर, मुझे इस संकट से बचाकर, भवसागर से उबार लीजिए।

shiva
Adi, Anadi shiv

मात-पिता भ्राता सब होई । संकट में पूछत नहिं कोई ।।

स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ।।

माता-पिता और भाई आदि सुख में ही साथी होते हैं, संकट आने पर कोई पूछता भी नहीं। हे जगत के स्वामी! आप पर ही मेरी आशा टिकी है, आप मेरे इस घोर संकट को दूर कीजिए।

धन निर्धन को देत सदाहीं । जो कोइ जांचे सो फल पाहीं ।।

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ।।

आप सदा ही निर्धनों की सहायता करते हैं। जिसने भी आपको जैसा जाना उसने वैसा ही फल प्राप्त किया। मैं प्रार्थना-स्तुति करने की विधि नहीं जानता। इसलिए कैसे करू? मेरी सभी भूलों को क्षमा करें।

शंकर को संकट के नाशन । विघ्न विनाशन मंगल कारन ।।

योगी यति मुनि ध्यान लगावें । नारद सारद शीश नवावें ।।

आप ही संकट का नाश करने वाले, समस्त शुभ कार्यों को कराने वाले और विघ्नहर्ता हैं। योगीजन, यति व मुनिजन आपका ही ध्यान करते हैं। नारद और सरस्वतीजी आपको ही शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ।।

जो यह पाठ करे मन लाई । ता पर होत हैं शंभु सहाई ।।

‘ॐ नमः शिवाय’ पंचाक्षर मंत्र का निरंतर जप करके भी देवताओं ने आपका पार नहीं पाया। जो इस शिव चालीसा का निष्ठा से पाठ करता है, भगवान शंकर उसकी सभी इच्छाएं पूरी करते हैं।

ऋनियां जो कोइ हो अधिकारी । पाठ करे सो पावनहारी ।।

पुत्र होन कर इच्छा कोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ।।

यदि ऋणी (कर्जदार) इसका पाठ करे तो वह ऋणमुक्त हो जाता है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से जो इसका पाठ करेगा, निश्चय ही शिव की कृपा से उसे पुत्र प्राप्त होगा।

पण्डित त्रयोदशी को लावै । ध्यान पूर्वक होम करावै ।।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । तन नहिं ताके रहै कलेशा ।।

प्रत्येक मास की त्रयोदशी को घर पर पण्डित को बुलाकर श्रद्धापूर्वक पूजन व हवन करना चाहिए। त्रयोदशी का व्रत करने वाले व्यक्ति के शरीर और मन को कभी कोई क्लेश (दुख) नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै शंकर सम्मुख पाठ सुनावै ।।

जन्म-जन्म के पाप नसावै । अंत धाम शिवपुर में पावै ।।

धूप, दीप और नैवेद्य से पूजन करके शंकरजी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर यह पाठ करना चाहिए। इससे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में शिव लोक में वास होता है अर्थात् मुक्ति हो जाती है।

कहत अयोध्या आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी ।।

नित्य नेम कर प्रात ही, पाठ करो चालीस । तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीस ।।

अयोध्यादास कहते हैं, हे शंकरजी! हमें आपकी ही आशा है, यह जानते हुए मेरे समस्त दुखों को दूर करिए। इस शिव चालीसा का चालीस बार प्रतिदिन पाठ करने से भगवान मनोकामना पूर्ण करेंगे।

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