Shri Krishna – If Not, The Result Would be Different.

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श्री क्रिष्ण – ना होते तो परिणाम अलग होते।

महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्‍ण ने कई लीलाएं दिखाई और बिना अस्‍त्र शस्‍त्र उठाए ही पांडवों को युद्ध में वीजयी बना दिया। महाभारत युद्ध धर्म बनाम अधर्म का था। महाभारत मे कई योद्धा थे लेकीन श्रीकृष्ण ही थे जो दशा ओर दिशा बदलना जाणते थे। वे शांती के प्रचारक थे लेकीन अधर्म इतना बढा था की ना चाहते हुये भी उन्हे महाभारत जैसा महा भयानक युद्ध करणा पढा। उन्होने हर बार शांती का प्रयत्न किया। लेकीन कुछ कौरवों की छल, कपट के कारण महाभारत जैसा भयंकर युध्द हुआ।

महाभारत मे मुख्य पात्र थे वो श्रीकृष्ण थे। लेकीन काफी लोगो का कहणा है की कृष्ण के छल के कारण पांडव जीत गये ओर कौरवों हारे। लेकीन यहापे सोचने वाली बात है की श्री कृष्ण ने आखिर ऐसा क्यो किया। आज हम कृष्ण के जीवन के गहराई यो को जानेंगे।

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shri krushna – Rajnitigya

श्री कृष्ण अध्यात्मिक पुरुष थे साथ ही राजनीतिज्ञ भी थे। कृष्ण आध्यात्मिक व्यक्ति हैं इस अर्थ में कि उन्होंने पूरे जीवन को चुना था। इसलिए कृष्ण से राजनीति डरे नही। राजनीति भी जीवन का हिस्सा है। पहली बात तो यह समझनी चाहिये कि कृष्ण के लिए जीवन के सब फूल और सब काँटे एक-साथ स्वीकृत किया। जीवन में उनका कोई चुनाव नहीं था, जीवन जैसा है वैसा वो जिये। फूल को चुना लेकीन काँटे को भी स्वीकार किया। तो कृष्ण राजनीति को सहज ही स्वीकार करते है। वे उसमें खड़े हो जाते हैं, उसकी उन्हें कोई कठिनाई नहीं है।

कृष्ण ऐसे साधनों का उपयोग करते हैं, जो कि उचित नहीं कहे जा सकते। ऐसे साधनों का उपयोग करते हैं, जिनका औचित्य कोई भी सिद्ध नहीं कर सकेगा। झूठ का, छल का, कपट का उपयोग करते हैं । लेकिन एक बात इसमें समझेगे तो बहुत आसानी हो जाएगी। जिंदगी में शुभ और अशुभ के बीच कभी भी चुनाव नहीं है, सिवाय सिद्धांतों को छोड़कर। जिंदगी में सब चुनाव कम बुराई, ज्यादा बुराई के बीच हैं । सवाल यह नहीं है कि कृष्ण ने जो किया वह बुरा था, सवाल यह है कि अगर वह न करते तो क्या उससे भला घटित होता कि और भी बुरा घटित होता?

भगवान कृष्ण को राजनीति और कूटनीति में दक्ष माना गया है। उनकी नीती छलपूर्ण नहीं थी। जब युद्ध में कौरवों ने अभिमन्यु को धोखे और नियम विरुद्ध मारकर नियम भंग किया तो फिर पांडव भी नियम पर चलने के लिए बाध्य नहीं रह गए थे। युद्ध के पहले भी कौरवों ने छलपूर्ण तरीके से पांडवों को वनवास भेजा और कई तरह के तकलीफे दिए थे। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को बचाने के लिए जो भी किया वह सत्य और धर्म की रक्षार्थ ही था।

कुछ उदाहरण है जो आपके सामने प्रस्तुत करणे जा रहा हू।

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Maharathi Karn

कर्ण

कर्ण महावीर, महादानी था। लेकीन वो असत्य के साथ खडा था।

कर्ण जानता था कि परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करेंगे। सीखने की चाहत में उसने एक नकली जनेऊ धारण किया और एक ब्राह्मण के रूप में परशुराम के पास चला गया। परशुराम ने उसे अपना शिष्य बना लिया, और वो सब कुछ सिखा दिया जो वे जानते थे। कर्ण बहुत जल्दी सीख गया। किसी भी अन्य शिष्य में उस तरह का स्वाभाविक गुण और क्षमता नहीं थी। परशुराम उससे बहुत खुश हुए। एक दिन जंगल में अभ्यास करते समय, परशुराम बहुत थक गए। उन्होंने कर्ण से कहा वे लेटना चाहते हैं। कर्ण बैठ गया ताकि परशुराम कर्ण की गोद में अपना सिर रख पाएं। फिर परशुराम सो गये। तभी एक खून चूसने वाला कीड़ा कर्ण की जांघ में घुस गया और उसका खून पीने लगा। उसे भयंकर कष्ट हो रहा था, और उसके जांघ से रक्त की धार बहने लगी। वह अपने गुरु की नींद को तोड़े बिना उस कीड़े को हटा नहीं सकता था। लेकिन अपने गुरु की नींद को तोड़ना नहीं चाहता था। धीरे-धीरे रक्त की धार परशुराम के शरीर तक पहुंची और इससे उनकी नींद खुल गई। परशुराम ने आंखें खोल कर देखा कि आस पास बहुत खून था। वे जान गये की ये कोई ब्राम्हण न होकर क्षत्रिय है ओर कर्ण को शाप दिया। युद्ध के समय उसके रथ का पहिया जमीन मे धस जायेगा। कर्ण कौरव सेना का सेनापती बना और अर्जुन से युद्ध के लिए आया। कर्ण के रथ का पहीया जमीन में धंस गया जिसे निकालने के लिए कर्ण ने अपने धनुष बाण रख दिया। निहत्‍थे कर्ण को देखकर श्री कृष्‍ण ने अर्जुन को कर्ण वध के लिए कहा और दिव्यास्‍त्र चलवा दिया। क्षण भर में कर्ण का अंत हो गया। साथ ही कर्ण ने जब ध्युत चल रहा था ओर द्रोपदी को ध्युत मे लाया गया तो द्रोपदी को वेश्या कहकर पुकारा था।

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Pitamah Bhism

भीष्म

महाभारत के अनुसार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और अंबालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया। तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत। अगले जन्म में अंबा ने शिखंडी के रूप में जन्म लिया और भीष्म की मृत्यु का कारण बनी। महाभारत युद्ध में विजय के लिए सबसे जरुरी था कि ‌पितामह भीष्म युद्ध क्षेत्र से हट जाएं। इसके लिए श्री कृष्‍ण ने अर्जुन के रथ पर शिखंडी को बैठाया। शिखंडी पूर्ण पुरुष नहीं था भीष्म इन्हें स्‍त्री मानते थे क्योंकी वह पूर्व जन्म में अंबा थी। भीष्म की प्रतीज्ञा थी की वह स्‍त्री पर ह‌थीयार नहीं चलाएंगे। इसी प्रतीज्ञा का लाभ उठाकर श्री कृष्‍ण ने अर्जुन को प्रेरीत किया कि वह पितामह भीष्म को वाणों की शैय्या पर लेटा दिया।

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Guru Dronacharya

द्रोणाचार्य

द्रोणाचार्य ऐसे योद्धा थे जिनके रहते युद्ध जीतना असंभव था। श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को द्रोण को हराने के लिए भेद का सहारा लेने को कहा और युद्ध में ये बात फैलाने के लिए कहा की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया। तब इसको अपने धर्म के विरुद्ध देख कर युधिष्ठिर इस कपट को नकारने की कोशिश करने लगे तभी एक योजना के तहत भीम ने अवंतिराज के एक अश्वत्थामा नामक हाथी का वध किया और युधक्षेत्र में ये बात फैलाने लगा कि अश्वत्थामा मारा गया। जब इस बात का द्रोण को इसका पता चला तो वो युधिष्ठिर के पास गए और पूछा कि सच में अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है तब युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा नामक मरे हुए हाथी को ध्यान में रख कर हाँ कह दिया। इसको सुन कर द्रोण को सदमा लगा और वो अपने अस्त्र शस्त्र त्याग कर अपने इकलौते पुत्र की मौत का शोक बनाने हेतु धरती पर बैठ गए। तभी पांडव सेना के सेनापति और द्रोपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से द्रोण का वध कर दिया।

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Jayandrat

जयंद्रत

महाभारत का भयंकर युद्ध चल रहा था। लड़ते-लड़के अर्जुन रणक्षेत्र से दूर चले गए थे। अर्जुन की अनुपस्थिति में पाण्डवों को पराजित करने के लिए द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। उसने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छह चरण भेद लिए, लेकिन सातवें चरण में उसे दुर्योधन जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया और उस पर टूट पड़े। जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर ज़ोरदार प्रहार किया। वह वार इतना तीव्र था कि अभिमन्यु उसे सहन नहीं कर सका और वीरगति को प्राप्त हो गया। अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा। अर्जुन ने प्रतीज्ञा ली कि वह सूर्यास्त तक जयद्रथ का वध नहीं कर पाए तो आत्मदाह कर लेंगे। अगर ऐसा हो जाता तो पांडवों की हार हो जाती। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा। जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है।’ यह कहकर उन्होंने अपनी माया समेट ली। देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। सबकी दृष्टि आसमान की ओर उठ गई। सूर्य अभी भी चमक रहा था। यह देख जयद्रथ और दुर्योधन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था। तभी श्रीकृष्ण चेतावनी देते हुए बोले-‘हे अर्जुन! जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक ज़मीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएँगे। उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।’ अर्जुन ने श्रीकृष्ण की चेतावनी ध्यान से सुनी और अपनी लक्ष्य की ओर ध्यान कर बाण छोड़ दिया। उस बाण ने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे लेकर सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर गिर गया। सिर के ज़मीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।

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Duryodhan

दुर्योधन

महाभारत मे दुर्योधन मुख्य सूत्रधार था।उनके राज्य को कपट द्यूत के द्वारा हँसते-हँसते जीत लिया और कुरु राज्य सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया। पांडव को 14 वर्ष वनवास भेजा। लाक्षाग्रह में पाण्डवों को भेजकर उन्हें आग से जलाने का प्रयत्न किया। पाण्डवों को एक इंच भूमी न देणा। दुर्योधन के कितने पाप थे। अगर कृष्ण मध्यस्ती न करते तो उसका भी वध करणा मुश्कील था। दुर्योधन का अंत भी श्री कृष्‍ण की छल बुद्धी से संभव हुआ। श्री कृष्‍ण ने दुर्योधन को माता के पास निर्वस्‍त्र होकर न जाने की सलाह दी जिससे कमर के निचे का हिस्सा वज्र का नहीं हो पाया। भीम के साथ जब दुर्योधन का युद्ध हुआ तब श्री कृष्‍ण ने भीम को सलाह दी कि कमर के नीचे के हिस्से पर प्रहार करो जबकी यह नियम के विरुद्ध था। कमर के नीचे गदा के प्रहार से भीम की मृत्यु हुई। इस तरह पांडवों को महाभारत में विजय श्री मिली।

अब आप समझ गये होंगे की भगवान श्री कृष्ण ने छल का सहारा क्यो लिया। क्योकी जैसा पेड बोवोगे वैसे ही फल मिलेंगे। इस आधार पर श्री कृष्ण को आप राजनीतिज्ञ कह सकते है।

आप एक कहाणी से समझ जायेंगे।

एक चर्च का पादरी एक रास्ते से गुजर रहा था। जोर से आवाज आती है कि बचाओ, बचाओ, मैं मर जाऊँगां। अँधेरा था। वह पादरी भागा हुआ भीतर पहुँचा। देखता है वहाँ कि एक बहुत कमजोर आदमी के ऊपर एक बहुत मजबूत आदमी छाती पर चढ़ा बैठा है। वह उसको चिल्लाकर कहता है कि हट, उस गरीब आदमी को क्यो दबा रहा है? लेकिन वह हटता नहीं, तो पादरी वह उस पर टूट पड़ता है, और उस मजबूत आदमी को नीचे गिरा देता है। वह जो नीचे आदमी है, वह ऊपर निकल आता है ओर भाग जाता है। तब बह ताकतवर आदमी उससे कहता है कि तुम कैसे आदमी हो?उस आदमी ने मेरा जेब काट लिया था और वह जेब काट कर भाग गया। वह पादरी कहता है। तूने यह पहले क्यों न कहा, मैं तो यह समझा कि तू ताकतवर है और कमजोर को दबाए हुए है, मैं समझा कि तू उसको मार रहा है! यह तो भूल हो गई। यह तो शुभ करते अशुभ हो गया । लेकिन वह आदमी तो उसकी जेब लेकर नदारद ही हो चुका था। जिंदगी में जब हम शुभ करने जाते हैं, तब भी देखना जरूरी है कि अशुभ तो न हो जाएगा ? इससे उल्टा भी देखना जरूरी है कि कुछ अशुभ करने से शुभ तो नहीं हो जाएगा?

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Bhagwan Shri Krishna

परिणाम

कृष्ण के सामने जो चुनाव था, वह बुरे और अच्छे के बीच नहीं था। कृष्ण के सामने जो चुनाव था। वह कम बुरे और ज्यादा बुरे के बीच था। और कृष्ण ने जिन-जिन छल-कपट का उपयोग किया, उनसे बहुत ज्यादा छल-कपट का उपयोग सामने का पक्ष कर रहा था और कर सकता था। युद्ध में छल और कपट शस्त्र हैं। और जब सामने वाला दुश्मन उनका पूरा उपयोग करने की तैयारी रखता हो, तो अपने को सर कटवा देने सिवाय नासमझी के और कुछ भी नहीं होता। कृष्ण किसी भले आदमी को धोखा नहीं दे रहे थे। कृष्ण किसी महात्मा को धोखा नहीं दे रहे थे। और जिनका गैर-महात्मापन हजार तरह से जाँचा जा चुका है, उनके साथ ही वह यह व्यवहार कर रहे थे। और कृष्ण ने सारे उपाय कर लिये थे युद्ध के पहले कि ये लोग राजी हो जाएँ, यह युद्ध न हो। इस सब उपाय के बावजूद, कोई मार्ग न छूटने पर यह युद्ध हुआ था। और जिन्होंने सब तरह की बेईमानियाँ की हों, जिनकी पूरी-की- पूरी कथा बेईमानियों और धोखे और चालबाजी की हों, उनके साथ कृष्ण अगर भलेपन का उपयोग करें, महाभारत के परिनाम दूसरे हुए होते। उसमें कौरव जीते होते और पांडव हारे होते। अब आप समझ गये होंगे की कृष्ण क्या थे।

जय श्री कृष्ण …….

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