श्रीराम ओर हनुमानजी की भक्तिमय प्रेम गाथा

श्रीराम ओर हनुमानजी की भक्तिमय प्रेम गाथा

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रामनवमी के उपलक्ष के रूप मे आपको, श्री राम के परम भक्त हनुमान की कहाणी बताने जा रहे है। जिसकी कहाणी सुनकर मन प्रसन्न हो जाता है, सब दुख दूर हो जाते है। भक्त ओर भगवान की अलौकिक कहाणी।

“श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में”

जब भी श्री राम का नाम आयेगा, तब तब रामभक्त हनुमान का नाम आयेगा। राम हनुमान के बिना अधुरे है ओर हनुमान राम के बिना। हनुमान को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार कहा जाता है और वे प्रभु श्री राम के अनन्य / परम भक्त हैं। हनुमान जी ने वानर जाति में जन्म लिया। उनकी माता का नाम अंजना (अंजनी) और उनके पिता वानरराज केशरी हैं। इसी कारण इन्हें आंजनाय और केसरीनंदन आदि नामों से पुकारा जाता है।

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जय हनुमान

जहां हनुमानजी हैं, वहीं श्रीराम भी और जहां श्रीराम हैं, वहीं हनुमानजी भी। श्रीराम ने एक लीला रची। जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपनी पत्नी सीता और भैया लक्ष्मण के साथ चौदह वर्षों के वनवास और रावण के साथ हुए युद्ध के पश्चात् अयोध्या वापस लौटे तब इस उपलक्ष में पूरे अयोध्या में हर्षो उल्लाहस था और सभी लोग खुशियां मना रहे थे। लंका पर विजय के बाद, अयोध्या में श्रीराम का दरबार भरा हुआ था। परम्परा के अनुसार राजा को विजय के उपलक्ष मे उपहार भेंट किए जाते हैं। विभीषण ने भी बहुमूल्य मणियों की एक माला श्रीराम को भेंट की। श्रीराम ने भेंट ग्रहण की। उन्हें तो किसी उपहार की आवश्यकता नहीं थी। यह जगत तो उन्हीं की परिकल्पना मात्र था। इस जगत की समस्त वस्तुएं तो उनकी अपनी थीं। उन्हे क्या जरुरत थी किसी माला की। लेकीन उन्हे तो लीला रचनी थी। मनुष्य तो खामखाह ही इन्हें अपनी समझने लगता है। फिर भी मर्यादावश, विभीषण की वह माला स्वीकार की और सीता को पहनने के लिए भेंट कर दी। सीता जी ने सोचा श्रीराम का अनन्य सेवक तो हनुमान है। ओर हनुमान की वजह से ही लंका विजय संभव हुई। उन्हें प्रभु ने अभी तक कोई पुरस्कार नहीं दिया। इसलिए उन्होंने अपनी ओर से वह माला श्री हनुमानजी को भेंट कर दी। चूंकि श्रीराम एक लीला रचना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने हनुमानजी को पहले कोई उपहार नहीं दिया था।

श्री हनुमानजी माला पाकर हर्षित नहीं हुए, उन्हें सांसारिक मालाओं की आवश्यकता नहीं थी, वह तो श्रीराम में डूबे हुए थे। श्रीराम की भक्ती मे डूबे थे। श्रीराम नाम ही उनकी माला थी। उन्होंने माला को पहले सिर पर रखा। उसे उतारा। उसे ध्यानपूर्वक देखा। फिर जीभ लगाकर उसका स्वाद चखा। फिर नाक से सूंघा। कान से लगाकर सुना, फिर उसे शरीर से भी लगाया। फिर उन्होंने माला का एक-एक दाना निकाला। एक एक दाने को तोड़कर फेंक दिया करते थे। इस प्रकार माला के सभी दाने तोड़े। उन्हें परखा और फेंक दिया। मणियों की माला माला न रही। एक-एक मणि, अनेक टुकड़ों में धरती पर पड़ी थी। माला बिखर गई। देखने वाले चकित हुए। हनुमानजी ने श्रीराम के दिए हुए उपहार को खंडित किया था। कुछेक ने पूछ ही लिया “हनुमंत, आपने ऐसा क्यों किया?”

प्रभु के भक्ती में डूबे, श्री हनुमानजी ने कहा- “ मैंने पहले माला को ध्यानपूर्वक देखा। शायद इसमें राम नाम लिखा हो। कहीं नहीं मिला। फिर मैंने इसका स्वाद चखा। जिव्हा को आनंद ही नहीं आया। तब इसे सूंघा। कोई सुगंध ही नहीं आई। फिर इसे कान से लगाया। मुझे राम नाम का राग ही सुनाई नहीं दिया। फिर शरीर से लगाया, शायद ठंडी या गर्म होगी, किंतु कुछ भी अनुभव नहीं हुआ। फिर एक-एक मनके को तोड़ा, शायद अंदर ही राम नाम हो। किसी मनके में राम नाम मिला ही नहीं। जब इस सारी माला में कहीं राम की सुगंध ही नहीं, राम का नाम ही नहीं, राम नाम का राग ही नहीं, तो फिर मेरे यह किस काम की?”

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जय श्री राम

किसी ने फिर बोला –“ आपके शरीर में, शरीर पर धारण किए गए वस्त्रों में, वस्तुओं में, क्या राम नाम है?” हनुमान ने तत्काल गदा दिखाई, सभी में, सभी को राम नाम के दर्शन हुए। सभी अवाक् रह गए— फिर उन्होंने अपनी छाती की फाड दि। हृदय तक में राम-नाम अंकित था। हनुमान के शरीर के रोम रोम मे श्री राम का नाम बसता है। तो इस प्रकार प्रभु श्री राम भक्त हनुमान जी ने समस्त संसार को दिखा दिया की उनके रोम रोम में प्रभु राम और सीता माता वास करते हैं। सभी अचम्भित हुए। सभी ने हाथ जोड़कर नमन किया। ओर श्रीराम ओर हनुमान का जयजयकार किया।

ये भक्त की श्रद्धा का कमाल था। भक्त पर भगवान की कृपा का। श्रीराम अपने परम भक्त का कौतुहल देखकर मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। उनकी आंखें अपने भक्त की अटूट प्रेम-भक्ति को देखकर भीतर ही भीतर सजल थीं और फिर उन्होंने अपने प्रिय भक्त को दिव्य आशीर्वाद से माला-माल कर दिया। कह दिया, हनुमंत तुम-सा मुझे प्रिय कोई अन्य नहीं। है भी नहीं। हनुमानजी में ही श्रीराम बसते हैं और श्रीराम में हनुमान।

हनुमान जी का दिव्य मंत्र

‘मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठ।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥’

इस जप करें सुख-समृद्धि और सेहत से जुड़ी आपकी मनोकामना जरूर पूरी होगी।

जय श्री राम भजन

श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में,
देख लो मेरे मन के नागिनें में ।

मुझ को कीर्ति न वैभव न यश चाहिए,
राम के नाम का मुझ को रस चाहिए ।
सुख मिले ऐसे अमृत को पीने में,
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में  ॥

अनमोल कोई भी चीज मेरे काम की नहीं
दिखती अगर उसमे छवि सिया राम की नहीं

राम रसिया हूँ मैं, राम सुमिरन करू,
सिया राम का सदा ही मै चिंतन करू ।
सच्चा आंनंद है ऐसे जीने में श्री राम,
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में ॥

फाड़ सीना हैं सब को यह दिखला दिया,
भक्ति में हैं मस्ती बेधड़क दिखला दिया ।
कोई मस्ती ना सागर मीने में,
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में  ॥

-सबको रामनवमी की शुभ कामनाये।-

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